मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें

अध्याय 52 — अथ पिटकलक्षणाध्यायः

बृहत्संहिता
10 श्लोक • केवल अनुवाद
ब्राह्मण आदि चार वर्षों को क्रम से सफेद, लाल, पीली और काली फुन्सी आगे कथित फल देने वाली होती है, किन्तु ब्राह्मणों को छोड़ कर अर्थात् केवल सफेद फुन्सी ब्राह्मणों को; सफेद और लाल क्षत्रियों को; सफेद, लाल और पोलो वैश्यों को तथा सफेद ताल, पौली और काली फुन्सी शूद्रों को फल देने वाली होती है।
यदि सुन्दर, निर्मल और स्पष्ट कान्ति पाली फुन्सी शिर में हो तो धनराशय, मस्तक में हो तो शीघ्र सौभाग्य, भूयुगल में हो तो दौर्भाग्य, धूमध्य में हो तो शीघ्र इष्ट बन्धुओं का संयोग और दुःशीलता, नेत्रपुट में हो तो शोक, थोनों नेत्रों में हो तो इशदर्शन, शंखस्थान में हो यो प्रजन्या ( संन्यास) तथा अनुपात के स्थान में हो तो चिन्ता प्रदान करती है।
यदि नासिका में फुन्सी हो तो वरसलाम, गाल में हो तो पुत्रलाभ, ओंठ और ठोड़ी में हो तो अत्रताप, ललाट तथा हनु में हो तो अधिक धनलाभ, कण्ठ में हो तो भूषण, अन और पान वस्तु का लाभ तथा कान में हो तो कान के आभूषणों का लाभ और अध्यात्म ज्ञान होता है।
यदि शिर की सन्धि, गर्दन, हृदय, स्तन, बगल और छाती में फुन्सी हो तो क्रम से शखपीड़ा, आपात, पुत्रलाभ, शोक और प्रिय वस्तु की प्राप्ति होती है तथा कन्ये में हो तो भिक्षा के लिये बार-बार प्रमण एवं कांख में हो तो धनों का अनेक तरह से नाश होता है।
यदि पीठ में फुन्सी हो तो दुःखसमूह का और बाँह में हो तो शत्रुसमुदाय का नाश करती है। मणिबन्ध में हो तो हाथों का बन्धन और दोनों बाहु के समीप हो तो भूषण आदि ( अत्र, वख) का लाभ कराती है।
यदि हाथ में फुन्सी हो तो धनलाभ, अंगुलियों में हो तो सौभाग्य, पेट में हो तो शोक, नाभि में हो तो सुन्दर अत्र-जल का लाग, नाभि के नीचे हो तो चोरों से धन का हरण, बस्ति (नाभि और लिंग के मध्य में हो तो धन-धान्य का लाभ, लिंग में हो तो खी और सुन्दर पुत्रों की प्राप्ति, गुदा में हो तो धनलाभ तथा अण्डकोश में हो तो सौभाग्य प्रदान करती है।
यदि ऊरु में फुन्सी हो तो बाहन और स्त्री का लाभ, जानु में हो तो शत्रुओं से क्षति, जांघ में हो तो शत्र से विनाश तथा गुल्फ (रखना पाँव की गांठी) में हो तो मार्ग और बन्धन में कष्ट देतो है।
यदि स्फिक् (कुत्ता) में फुन्न हो तो धननाश, एड़ी में हो तो अगम्य स्थान में गमन, पाँव में हो तो भ्रमण, अंगुलियों में बन्धन और अंगूठे में हो तो बन्धुओं से पूजा- सत्कार की प्राप्ति कराती है।
उत्पात ( अंगस्पन्दन), गण्ड (एक प्रकार की फुन्सी) और फुन्सी दक्षिण में आपात तथा वाम में पुरुषों के शुभ होते हैं। इसके विपरीत स्त्रियों के; जैसे-उत्पात, गण्ड और पिटक वाम में आघात तथा दक्षिण में शुभ होते हैं।
इस तरह शिर से लेकर प्रत्येक अंग को फुन्सियों के फल कहे गये हैं। इसी तरह व्रण और तिल के फल की भी कल्पना करनी चाहिये तथा प्राणियों के शरीर में मशक, चिह्न और रोमावर्तजन्य फां भी पूर्वोक्तानुसार ही प्राप्त होते हैं।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें