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बृहत्संहिता • अध्याय 52 • श्लोक 6
धनाप्तिं सौभाग्यं शुचमपि कराङ्गल्युदरगाः सुपानानं नाभी तदद्य इह चौरैर्धनहतिम्। धनं धान्यं बस्ती युवतिमथ मेढ़े सुतनयान् धनु सौभाग्यं वा गुदवृषणजाता विदर ति ॥
यदि हाथ में फुन्सी हो तो धनलाभ, अंगुलियों में हो तो सौभाग्य, पेट में हो तो शोक, नाभि में हो तो सुन्दर अत्र-जल का लाग, नाभि के नीचे हो तो चोरों से धन का हरण, बस्ति (नाभि और लिंग के मध्य में हो तो धन-धान्य का लाभ, लिंग में हो तो खी और सुन्दर पुत्रों की प्राप्ति, गुदा में हो तो धनलाभ तथा अण्डकोश में हो तो सौभाग्य प्रदान करती है।
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