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बृहत्संहिता • अध्याय 52 • श्लोक 4
शिरः सन्धिश्रीवाहृदयकुचपाश्वॉरसि अयोपातं घातं सुततनयलाभं गता शुचमपि । प्रियप्राप्तिं स्कन्धेऽप्यटनमथ भिक्षार्थमसकृ- द्विनाशं कक्षोत्या विदधति धनानां बहुमुखम् ॥
यदि शिर की सन्धि, गर्दन, हृदय, स्तन, बगल और छाती में फुन्सी हो तो क्रम से शखपीड़ा, आपात, पुत्रलाभ, शोक और प्रिय वस्तु की प्राप्ति होती है तथा कन्ये में हो तो भिक्षा के लिये बार-बार प्रमण एवं कांख में हो तो धनों का अनेक तरह से नाश होता है।
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