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बृहत्संहिता • अध्याय 52 • श्लोक 10
इति पिटकविभागः प्रोक्त आमूर्धतोऽयं व्रणतिलकविभागोऽप्येवमेव प्रकल्प्यः । भवति मशकलक्ष्मावर्तजन्मापि तद्व- न्निगदितफलकारि प्राणिनां देहसंस्थम् ॥
इस तरह शिर से लेकर प्रत्येक अंग को फुन्सियों के फल कहे गये हैं। इसी तरह व्रण और तिल के फल की भी कल्पना करनी चाहिये तथा प्राणियों के शरीर में मशक, चिह्न और रोमावर्तजन्य फां भी पूर्वोक्तानुसार ही प्राप्त होते हैं।
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