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बृहत्संहिता • अध्याय 52 • श्लोक 2
सुस्निग्धव्यक्तशोभाः शिरसि धनचयं मूर्छिन सौभाग्यमारा- दौर्भाग्यं भूयुगोत्याः प्रियजनपटनामाशु दुःशीलतां च। तन्मध्योत्याच शोकं नयनपुटगता प्रव्रज्यां शङ्खदेशेऽ श्रुजलनिपतनस्थानगा नेत्रयोरिष्टदृष्टिं रान्ति चिन्ताम् ॥
यदि सुन्दर, निर्मल और स्पष्ट कान्ति पाली फुन्सी शिर में हो तो धनराशय, मस्तक में हो तो शीघ्र सौभाग्य, भूयुगल में हो तो दौर्भाग्य, धूमध्य में हो तो शीघ्र इष्ट बन्धुओं का संयोग और दुःशीलता, नेत्रपुट में हो तो शोक, थोनों नेत्रों में हो तो इशदर्शन, शंखस्थान में हो यो प्रजन्या ( संन्यास) तथा अनुपात के स्थान में हो तो चिन्ता प्रदान करती है।
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