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बृहत्संहिता • अध्याय 52 • श्लोक 8
स्फिक्याष्र्णिपादजाता धननाशागम्यगमनमध्वानम् । वन्यनमङ्गुलिनिचयेऽङ्गुष्ठे च ज्ञातिलोकतः पूजाम् ॥
यदि स्फिक् (कुत्ता) में फुन्न हो तो धननाश, एड़ी में हो तो अगम्य स्थान में गमन, पाँव में हो तो भ्रमण, अंगुलियों में बन्धन और अंगूठे में हो तो बन्धुओं से पूजा- सत्कार की प्राप्ति कराती है।
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