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बृहत्संहिता • अध्याय 52 • श्लोक 3
प्राणागण्डे वसनसुतदाश्चौष्ठयोरन्त्रलाभं कुर्युस्तद्वच्चिबुकतलगा भूरि वित्तं ललाटे। हन्वोरेवं गलकृतपदा भूषणान्यन्नपाने श्रोत्रे तद्भूषणगणमपि ज्ञानमात्मस्वरूपम् ॥
यदि नासिका में फुन्सी हो तो वरसलाम, गाल में हो तो पुत्रलाभ, ओंठ और ठोड़ी में हो तो अत्रताप, ललाट तथा हनु में हो तो अधिक धनलाभ, कण्ठ में हो तो भूषण, अन और पान वस्तु का लाभ तथा कान में हो तो कान के आभूषणों का लाभ और अध्यात्म ज्ञान होता है।
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