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अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग

भगवद गीता
47 श्लोक • केवल अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले - हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छावाले, मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
संजय ने कहा - हे राजन्! पाण्डवों की सेना की व्यूहरचना का अवलोकन कर, राजा दुर्योधन ने अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास जाकर इस प्रकार के शब्द कहे।
दुर्योधन ने कहा - पूज्य आचार्य! पाण्डु पुत्रों की विशाल सेना का अवलोकन करें, जिसे आपके द्वारा प्रशिक्षित बुद्धिमान शिष्य, द्रुपद के पुत्र ने कुशलतापूर्वक युद्ध करने के लिए सुव्यवस्थित किया है।
यहाँ इस सेना में भीम और अर्जुन के समान बलशाली युद्ध करने वाले महारथी युयुधान, विराट और द्रुपद जैसे अनेक शूरवीर धनुर्धर हैं।
यहाँ पर इनके साथ धृष्टकेतु, चेकितान, काशी के पराक्रमी राजा 'कांशिराज', पुरूजित, कुन्तीभोज और शैव्य सभी महान सेना नायक हैं।
इनकी सेना में पराक्रमी युधमन्यु, शूरवीर, उत्तमौजा, सुभद्रा और द्रोपदी के पुत्र भी हैं जो सभी निश्चय ही महाशक्तिशाली योद्धा हैं।
हे ब्राह्मण श्रेष्ठ! हमारे पक्ष की ओर के उन सेना नायकों के संबंध में भी सुनो, जो सेना को संचालित करने में विशेष रूप से निपुण हैं। अब मैं तुम्हारे समक्ष उनका वर्णन करता हूँ।
इस सेना में सदा विजयी रहने वाले आपके समान भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण तथा सोमदत्त का पुत्र 'भूरिश्रवा' आदि महा पराक्रमी योद्धा हैं, जो युद्ध में सदा विजेता रहे हैं।
यहाँ हमारे पक्ष में अन्य अनेक महायोद्धा भी हैं जो मेरे लिए अपने जीवन का बलिदान करने के लिए तत्पर हैं। वे युद्ध कौशल में पूर्णतया निपुण और विविध प्रकार के शस्त्रों से सुसज्जित हैं।
हमारी शक्ति असीमित है, और हम सब महान सेना नायक 'भीष्म पितामह' के नेतृत्व में पूरी तरह से संरक्षित हैं, जबकि पाण्डवों की सेना की शक्ति भीम द्वारा भलीभाँति रक्षित होने के पश्चात भी सीमित है।
अतः मैं कौरव सेना के सभी योद्धागणों से भी आग्रह करता हूँ कि सब अपने मोर्चे पर अडिग रहते हुए भीष्म पितामह की पूरी सहायता करें।
तत्पश्चात कुरू वंश के वयोवृद्ध परम यशस्वी महायोद्धा एवं वृद्ध 'भीष्म पितामह' ने सिंह गर्जना जैसी ध्वनि करने वाले अपने शंख को उच्च स्वर से बजाया, जिसे सुनकर दुर्योधन हर्षित हुआ।
इसके पश्चात शंख, नगाड़े, बिगुल, तुरही तथा सींग अचानक एक साथ बजने लगे। उनका समवेत स्वर अत्यन्त भयंकर था।
तत्पश्चात पाण्डवों की सेना के बीच श्वेत अश्वों द्वारा खींचे जाने वाले भव्य रथ पर आसीन 'माधव' और 'अर्जुन' ने अपने-अपने दिव्य शंख बजाये।
ऋषीकेश भगवान् कृष्ण ने अपना पाञ्जन्य शंख बजाया, अर्जुन ने देवदत्त शंख तथा अतिभोजी एवं अति दुष्कर कार्य करने वाले भीम ने पौण्ड्रं नामक भीषण शंख बजाया।
हे पृथ्वीपति राजन्! राजा युधिष्ठिर ने अपना अनन्त विजय नाम का शंख बजाया, तथा नकुल और सहदेव ने सुघोष एवं मणिपुष्पक नामक शंख बजाये।
श्रेष्ठ धनुर्धर काशीराज, महा योद्धा शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, विराट, अजेय सात्यकि, और
द्रुपद, द्रौपदी के पांच पुत्रों तथा सुभद्रा के महाबलशाली पुत्र वीर अभिमन्यु आदि सबने अपने-अपने अलग-अलग शंख बजाये।
हे धृतराष्ट्र! इन शंखों से उत्पन्न ध्वनि द्वारा, आकाश और धरती के बीच हुई गर्जना ने आपके पुत्रों के हृदयों को विदीर्ण कर दिया।
उस समय हनुमान के चिह्न की ध्वजा लगे रथ पर आसीन, पाण्डु पुत्र अर्जुन अपना धनुष उठा कर बाण चलाने के लिए उद्यत दिखाई दिया। हे राजन! आपके पुत्रों को अपने विरूद्ध व्यूह रचना में खड़े देख कर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से यह वचन कहे।
अर्जुन ने कहा - हे अच्युत! मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच खड़ा करने की कृपा करें।
मैं यहाँ एकत्रित युद्ध करने की इच्छा रखने वाले योद्धाओं जिनके साथ मुझे इस महासंग्राम में युद्ध करना है, को देख सकूं।
मैं उन लोगों को देखने का इच्छुक हूँ, जो यहाँ पर धृतराष्ट्र के दुश्चरित्र पुत्रों को प्रसन्न करने की इच्छा से युद्ध लड़ने के लिए एकत्रित हुए हैं।
संजय ने कहा - हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! निद्रा पर विजय पाने वाले अर्जुन द्वारा इस प्रकार के वचन बोले जाने पर, भगवान श्रीकृष्ण ने उस भव्य रथ को दोनों सेनाओं के बीच में ले जाकर खड़ा कर दिया।
भीष्म, द्रोण तथा अन्य सभी राजाओं की उपस्थिति में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, हे पार्थ! यहाँ पर एकत्रित समस्त कुरुओं को देखो।
अर्जुन ने वहाँ खड़ी दोनों पक्षों की सेनाओं के बीच अपने पिता तुल्य चाचाओं, ताऊओं, पितामहों, गुरुओं, मामाओं, भाइयों, चचेरे भाइयों, पुत्रों, भतीजों, मित्रों, ससुर, और शुभचिन्तकों को भी देखा।
जब कुन्तिपुत्र अर्जुन ने अपने बंधु बान्धवों को वहाँ देखा, तब उसका मन अत्यधिक करुणा से भर गया और फिर गहन शोक के साथ उसने निम्न वचन कहे।
अर्जुन ने कहा - हे कृष्ण! युद्ध करने की इच्छा से एक दूसरे का वध करने के लिए, यहाँ अपने वंशजों को देखकर मेरे शरीर के अंग कांप रहे हैं, और मेरा मुंह सूख रहा है।
मेरा मन उलझ रहा है और मुझे घबराहट हो रही है। अब मैं यहाँ और अधिक खड़ा रहने में समर्थ नहीं हूँ।
केशी राक्षस को मारने वाले, हे केशव! मुझे केवल अमंगल के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। युद्ध में अपने वंश के बंधु बान्धवों का वध करने में मुझे कोई अच्छाई नही दिखाई देती है, और उन्हें मारकर मैं कैसे सुख पा सकता हूँ?
हे कृष्ण! मुझे विजय, राज्य और इससे प्राप्त होने वाला सुख नहीं चाहिए। ऐसा राज्य सुख या अपने जीवन से क्या लाभ प्राप्त हो सकता है।
क्योंकि जिन लोगों के लिए हम यह सब चाहते हैं, वे सब इस युद्धभूमि में हमारे समक्ष खड़े हैं।
जब आचार्यगण, पितृगण, पुत्र, पितामह, मामा, पौत्र, ससुर, भांजे, साले और अन्य संबंधी अपने प्राण और धन का दाव लगाकर यहाँ उपस्थित हुए हैं।
यद्यपि वे मुझपर आक्रमण भी करते हैं, तथापि, मैं इनका वध क्यों करूं? यदि फिर भी हम धृतराष्ट्र के पुत्रों का वध करते हैं, तब भले ही इससे हमें पृथ्वी के अलावा तीनों लोक भी प्राप्त क्यों न होते हों, तब भी उन्हें मारने से हमें सुख कैसे प्राप्त होगा?
हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा।
अतएव, हे माधव! अपने ही बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के लिए हम योग्य नहीं हैं, क्योंकि अपने ही कुटुम्ब को मारकर हम कैसे सुखी होंगे?
यद्यपि लोभ से अभिभूत विचारधारा के कारण वे अपने स्वजनों के विनाश या प्रतिशोध के कारण और अपने मित्रों के साथ विश्वासघात करने में कोई दोष नही देखते हैं।
तथापि, हे जनार्दन! जब हमें स्पष्टतः अपने बंधु बान्धवों का वध करने में अपराध दिखाई देता है, तब हम ऐसे पापमय कर्म से क्यों न दूर रहें?
जब कुल का नाश हो जाता है तब इसकी कुल परम्पराएं भी नष्ट हो जाती हैं और कुल के शेष परिवार अधर्म में प्रवृत्त होने लगते हैं।
अधर्म की प्रबलता के साथ, हे कृष्ण! कुल की स्त्रियां दूषित हो जाती हैं, और स्त्रियों के दुराचारिणी होने से, हे वृष्णिवंशी! अवांछित संतानें जन्म लेती हैं।
अवांछित सन्तानों की वृद्धि के परिणामस्वरूप, निश्चय ही परिवार और पारिवारिक परम्परा का विनाश करने वालों का जीवन नारकीय बन जाता है। जल तथा पिण्डदान की क्रियाओं से वंचित हो जाने के कारण, ऐसे पतित कुलों के पित्तरों का भी पतन हो जाता है।
अपने दुष्कर्मों से कुल परम्परा का विनाश करने वाले दुराचारियों के कारण समाज में अवांछित सन्तानों की वृद्धि होती है और विविध प्रकार की सामुदायिक और परिवार कल्याण की गतिविधियों का भी विनाश हो जाता है।
हे जनार्दन! मैंने गुरुजनों से सुना है कि जो लोग कुल परंपराओं का विनाश करते हैं, वे अनिश्चितकाल के लिए नरक में डाल दिए जाते हैं।
ओह! कितने आश्चर्य की बात है, कि हम मानसिक रूप से इस महा पापजन्य कर्म करने के लिए उद्यत हैं। राजसुख भोगने की इच्छा के प्रयोजन से हम अपने वंशजों का वध करना चाहते हैं।
यदि धृतराष्ट्र के शस्त्र युक्त पुत्र, मुझ निहत्थे को रणभूमि में प्रतिरोध किए बिना भी मार देते हैं, तब यह मेरे लिए श्रेयस्कर होगा।
संजय ने कहा - इस प्रकार यह कह कर अर्जुन ने अपना धनुष और बाणों को एक ओर रख दिया, और शोकाकुल चित्त से अपने रथ के आसन पर बैठ गया, उसका मन व्यथा और दुख से भर गया।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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