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अध्याय 7 — उत्तरकाण्ड

बरवै रामायण
27 श्लोक • केवल अनुवाद
चित्रकूट में पयस्विनी नदी के किनारे (किसी वृक्ष के नीचे) रहना कल्पवृक्ष के नीचे (स्वर्ग में) रहने के समान है। तुलसीदासजी (अपने मन से) कहते हैं - अरे मन! यहाँ श्रीराम-लक्ष्मण एवं जानकीजी का स्मरण करो।
तुलसीदासजी कहते हैं – अरे मन! पयस्विनी नदी में स्नान करके फल खाकर रहो, सब प्रकार की आशाओं को छोड़ दो और (केवल) श्रीसीतारामजी के चरणों का स्मरण करो।
तुलसीदासजी कहते हैं – अरे मन! स्वार्थ (लौकिक हित) तथा परमार्थ-(आत्मकल्याण) के लिये एक ही उपाय है कि श्रीसीतारामजी के चरणों में प्रेम बढ़ाओ।
तुलसीदासजी कहते हैं – अरे मन! सावधान होकर भयंकर काल (मृत्यु) को (समीप) देखो और प्रेमपूर्वक श्रीराम नाम का जप करो।
तुलसीदासजी कहते हैं – अरे मन! सब प्रकार के संकट एवं शोक को नष्ट करने वाले तथा सम्पूर्ण मंगलों के निकेतन श्रीराम-नाम से प्रेम करना चाहिये।
तुलसीदासजी कहते हैं – अरे मन! कलियुग में न ज्ञान सम्भव है न वैराग्य, न योग ही सध सकता है, फिर समाधि की तो कौन कहे। (अतः इस युग में) नित्य (सर्वदा) विघ्न रहित राम-नाम का जप करो।
तुलसीदासजी कहते हैं – अरे मन! राम-नाम के दो अक्षरों को राम-लक्ष्मण के समान हृदय से (अपना) हितकारी समझो और किसी शिक्षा को मन में स्थान मत दो।
तुलसीदासजी कहते हैं - अरे मन! राम का नाम ही (तुम्हारे लिये) माता, पिता, गुरु और स्वामी है। जिसे यह अच्छा न लगे, उसके लिये विधाता प्रतिकूल है (जन्म-मरण के चक्र में भटकना ही उसके भाग्य में बदा है)।
तुलसीदासजी कहते हैं – अरे मन! शोक (चिन्ता) रहित होकर राम-नाम का जप करो। इससे इस लोक में सब प्रकार से कल्याण और परलोक में भी भला होगा।
तुलसीदासजी कहते हैं – अरे मन! जो तपस्या, तीर्थयात्रा, यज्ञ, दान, नियम-पालन, उपवास आदि सबसे अधिक (फलदाता) हैं, उस राम-नाम का जप करो।
श्रीराम-नाम की महिमा शङ्करजी जानते हैं, जो काशी में (मरते हुए प्राणी को) उसका उपदेश करके परम पद (मोक्ष) देते हैं।
तुलसीदासजी कहते हैं कि आदिकवि वाल्मीकिजी ने राम-नाम का प्रभाव जाना था, जिसका उलटा जप करके वे कोल-(ब्याध) से ऋषिराज हो गये।
महर्षि अगस्त्य ने हृदय से (राम) नाम का प्रताप जाना, जिन्होंने मन में ही उसका जप करके खेल-ही-खेल में समुद्र को सोख लिया।
तुलसीदासंजी कहते हैं कि श्रीराम का स्मरण करने से ही (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) चारों फल सुलभ हो जाते हैं। (यह बात) वेद-पुराण पुकारकर कहते हैं और शङ्करजी भी कहते हैं।
तुलसीदासजी कहते हैं - अरे मन! राम-नाम से प्रेम का निर्वाह करो। इससे अधिक तो क्या इसके बराबर भी जीवन का कोई (दूसरा) लाभ नहीं है।
तुलसीदासजी कहते हैं – अरे मन! राम-नाम समस्त दोषों, पापों, दुःखों और दरिद्रता को जला डालने वाला तथा सम्पूर्ण श्रेष्ठ मङ्गलों को देने वाला है।
तुलसीदासजी कहते हैं कि मैं किस गिनती में था, मेरी तो वह दशा थी जो वन की घास की होती है, किंतु राम-नाम का जप करने से वही मैं तुलसी (के समान पवित्र एवं आदरणीय) हो गया।
तुलसीदासजी कहते हैं – तन्त्रशास्त्र, वेद तथा पुराण रेखा खींचकर (निश्चयपूर्वक कहते हैं कि) राम-नाम-स्मरण (सबसे) उत्तम है।
तुलसीदासजी कहते हैं – अरे मन! राम-नाम का स्मरण करो और सत्पुरुषों की सेवा करो। (इस प्रकार) अपार संसार-सागर के पार उत्तर जाओ।
तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीराम का नाम कामधेनु है और उनका रूप कल्पवृक्ष के समान है। श्रीराम-नाम का स्मरण करने से ही चारों फल सुलभ हो जाते (सरलता से मिल जाते) हैं।
तुलसीदासजी कहते हैं कि (श्रीराम से प्रेम करने की बात) कहते-सुनते तो सब हैं, किंतु समझता (आचरण में लाता) कोई ही है। बड़ा सौभाग्य (उदय) होने पर श्रीराम से प्रेम होता है।
(लोग) एक-दूसरे कों (नाम-जप की) शिक्षा तो देते हैं, किंतु स्वयं जप नहीं करते। तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीराम के प्रेम में बाधा देने वाला उनका पाप ही है।
तुलसीदासजी कहते हैं कि सब लोग सभी मरणासन्न व्यक्तियों से कहते हैं – ‘राम का स्मरण करो’, किंतु सबका परिणाम (निश्चित मृत्यु है, यह) समझकर अभी (जीवनकाल में ही नाम का) जप नहीं करते।
तुलसीदासजी कहते हैं कि आलस्य को छोड़ दो और राम-नाम का जप करो। राम से विमुख होकर इस कलियुग में कौन भाँड़ (नाना रूप बनाकर बहुरूपिये के समान घूमने को विवश) नहीं हुआ।
तुलसीदासजी कहते हैं कि राम-नाम के समान दूसरा कोई मित्र नहीं है, जो शरीर का अन्त होने पर (जीव को) श्रीराम के धाम में पहुँचा देता है।
(प्रार्थना करते हुए गोस्वामी जी कहते हैं) हे रघुनाथजी! इस तुलसीदास को तो जन्म-जन्म में अपना भरोसा, अपने नाम का बल और अपने नाम में प्रेम दीजिये।
आप जन्म-जन्म में जहाँ-जहाँ (जिस-जिस योनि में) तुलसीदास को शरीर-धारण करायें, वहाँ-वहाँ हे मेरे स्वामी श्रीराम! मेरे साथ स्नेह का निर्वाह करें (मुझ पर स्नेह रखें)।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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