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बरवै रामायण • अध्याय 7 • श्लोक 1
चित्रकूट पय तीर सो सुरतरू बास । लखन राम सिय सुकतरहु तुलसीदास॥
चित्रकूट में पयस्विनी नदी के किनारे (किसी वृक्ष के नीचे) रहना कल्पवृक्ष के नीचे (स्वर्ग में) रहने के समान है। तुलसीदासजी (अपने मन से) कहते हैं - अरे मन! यहाँ श्रीराम-लक्ष्मण एवं जानकीजी का स्मरण करो।
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