कलि नहिं ग्यान बिराग न जोग समाधि ।
राम नाम जपु तुलसी नित निरूपाधि॥
तुलसीदासजी कहते हैं – अरे मन! कलियुग में न ज्ञान सम्भव है न वैराग्य, न योग ही सध सकता है, फिर समाधि की तो कौन कहे। (अतः इस युग में) नित्य (सर्वदा) विघ्न रहित राम-नाम का जप करो।
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