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अध्याय 4 — विषयनिग्रह
प्रबोधसुधाकर
10 श्लोक • केवल अनुवाद
अगाध विषय-जल से भरे हुए इस संसार-समुद्र में नर-देहरूप एक नौका है, जो कर्म-वायु से प्रेरित होकर इधर-उधर डगमगाती फिरती है।
यह नौका (इन्द्रिय-गोलकरूप) नौ छिद्रों से युक्त है, इसका स्वामी जीव अत्यन्त आलसी है। छिद्रों के न रोकने से उसमें (विषय-रूप) जल भर जाता है और वह निरन्तर डूबती रहती है।
इन छिद्रों के रोक देने से यह सुखपूर्वक संसार-सागर के उस पार पहुँच सकती है, इसलिये इन्द्रिय-निग्रह के बिना इस मिथ्या परपंच को कोई पार नहीं कर सकता।
पुरुष परस्त्री को कामवश देखता है और उसकी प्राप्ति की कामना भी करता है। यद्यपि यह जानता है कि उसका मिलना सर्वथा असम्भव है तथापि (उसकी कामना करके) वह व्यर्थ घोर पाप का भागी बन जाता है।
मनुष्य अपने कानों से चुगलखोरों द्वारा मनमानी कही हुई परायी निन्दा सुनता रहता है; इससे क्या यह पुरुष (जिसकी निन्दा की जाती है) मर जाता है? (उसका तो कुछ भी नहीं विगड़ना) उल्टे निन्दा सुनने वाला ही, घोर पाप का भागी बन जाता है।
जिह्वा क्षण-क्षण मे दूसरे पुरुषों की निन्दा और मिध्याभाषण किया करती है, इससे दूसरों की क्या हानि अथवा (अपना क्या) लाभ हो सकता है! वह निन्दक पुरुष व्यर्थ ही महापाप का भागी हो जाता है।
विषय और इन्द्रियों का संयोग होने पर पुरुष को पलभर के लिये जो सुख होता है, विषय के नष्ट होने पर वही यावजीवन दुःखरूप हो जाता है।
अतः इन दोनों में त्याज्य और ग्राह्य का भलीभाँति विचार करके यह निश्चय हुआ कि यदि बुद्धिमान् पुरुष अल्प सुख की वासना छोड़ दे तो वह बड़े भारी दुःख का अन्त कर देता है।
धीवर द्वारा काँटे में लगाकर डाले हुए थोड़े से मांस को खाने से मछली को प्राण-त्याग करना पड़ता है, इसी प्रकार विषयों का सेवन करता हुआ पुरुष काल के जाल में पड़कर नष्ट हो जाता है।
सर्प के द्वारा आधा निगल लिये जाने पर भी मेंढक सैकड़ों मक्खियों को खाता रहता है, इसी प्रकार तृष्णान्ध पुरुष अवस्था के ढल जाने पर भी विषय-सेवन करता ही रहता है।
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