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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 4 • श्लोक 6
अनृतं परापवादं रसना वदति प्रतिक्षणं तेन । परहानिर्लब्धिः का व्यर्थं मनुजोऽतिपापभाग्भवति ॥
जिह्वा क्षण-क्षण मे दूसरे पुरुषों की निन्दा और मिध्याभाषण किया करती है, इससे दूसरों की क्या हानि अथवा (अपना क्या) लाभ हो सकता है! वह निन्दक पुरुष व्यर्थ ही महापाप का भागी हो जाता है।
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