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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 4 • श्लोक 1
संसृतिपारावारे ह्यगाधविषयोदकेन सम्पूर्णे । नृशरीरमम्बुतरणं कर्मसमीरैरतस्ततश्चलति ॥
अगाध विषय-जल से भरे हुए इस संसार-समुद्र में नर-देहरूप एक नौका है, जो कर्म-वायु से प्रेरित होकर इधर-उधर डगमगाती फिरती है।
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