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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 4 • श्लोक 8
हेयमुपादेयं वा प्रविचार्य सुनिश्चितं तस्मात् । अल्पसुखस्य त्यागादनल्पदुःखं जहाति सुधीः ॥
अतः इन दोनों में त्याज्य और ग्राह्य का भलीभाँति विचार करके यह निश्चय हुआ कि यदि बुद्धिमान् पुरुष अल्प सुख की वासना छोड़ दे तो वह बड़े भारी दुःख का अन्त कर देता है।
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