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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 4 • श्लोक 2
छिद्रैर्नवभिरुपेतं जीवो नौकापतिर्महानलसः । छिद्राणामनिरोधाज्जलपरिपूर्ण पतत्यधः सततम् ॥
यह नौका (इन्द्रिय-गोलकरूप) नौ छिद्रों से युक्त है, इसका स्वामी जीव अत्यन्त आलसी है। छिद्रों के न रोकने से उसमें (विषय-रूप) जल भर जाता है और वह निरन्तर डूबती रहती है।
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