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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 4 • श्लोक 10
उरगग्रस्तार्धतनुर्भेकोऽश्नातीह मक्षिकाः शतशः । एवं गतायुरपि सन्विषयान्समुपार्यत्यन्धः ॥
सर्प के द्वारा आधा निगल लिये जाने पर भी मेंढक सैकड़ों मक्खियों को खाता रहता है, इसी प्रकार तृष्णान्ध पुरुष अवस्था के ढल जाने पर भी विषय-सेवन करता ही रहता है।
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