मनुष्य अपने कानों से चुगलखोरों द्वारा मनमानी कही हुई परायी निन्दा सुनता रहता है; इससे क्या यह पुरुष (जिसकी निन्दा की जाती है) मर जाता है? (उसका तो कुछ भी नहीं विगड़ना) उल्टे निन्दा सुनने वाला ही, घोर पाप का भागी बन जाता है।
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