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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 4 • श्लोक 3
छिद्राणां तु निरोधात्सुखेन पारं परं याति । तस्मादिन्द्रियनिग्रहमृते न कश्चित्तरत्यनृतम् ॥
इन छिद्रों के रोक देने से यह सुखपूर्वक संसार-सागर के उस पार पहुँच सकती है, इसलिये इन्द्रिय-निग्रह के बिना इस मिथ्या परपंच को कोई पार नहीं कर सकता।
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