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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 4 • श्लोक 4
पश्यति परस्य युवति सकाममपि तन्मनोरथं कुरुते । ज्ञात्वैव तदप्राप्तिं व्यर्थं मनुजोऽतिपापभाग्भवति ॥
पुरुष परस्त्री को कामवश देखता है और उसकी प्राप्ति की कामना भी करता है। यद्यपि यह जानता है कि उसका मिलना सर्वथा असम्भव है तथापि (उसकी कामना करके) वह व्यर्थ घोर पाप का भागी बन जाता है।
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