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अध्याय 17 — ध्यानविधि
प्रबोधसुधाकर
10 श्लोक • केवल अनुवाद
श्रीयमुनाजी के तट पर स्थित वृन्दावन के किसी महामनोहर उद्यान में जो कल्पवृक्ष के नीचे पृथिवी पर पाँव पर पाँव रखे बैठे हैं,
जो मेघ के समान श्यामवर्ण हैं, अपने तेज मे इस निखिल ब्रह्माण्ड को प्रकाशित कर रहे हैं, सुन्दर पीताम्बर धारण किये हुए हैं, समस्त शरीर में कर्पूरमिश्रित चन्दन का लेप लगाये हुए हैं,
जिनके कर्णपर्यन्त विशाल नेत्र हैं, कान कुण्डल के जोड़े से सुशोभित हैं, मुख-कमल मन्द-मन्द मुसका रहा है, तथा वक्षःस्थल में कौस्तुभ-मणियुक्त सुन्दर हार है और
जो अपनी कान्ति से कङ्कण और अंगूठी आदि सुन्दर आभूषणों की भी शोभा बढ़ा रहे हैं, जिनके गले में बनमाला लटक रही है और अपने तेज से जिन्होंने कलिकाल को परास्त कर दिया है तथा
जिनका गुञ्जारवलिविभूषित मस्तक गूँजते हुए भ्रमर-समूह से सुशोभित है, किसी कुञ्ज के भीतर बैठकर ग्वालवालों के साथ भोजन करते हुए उन श्रीहरि का स्मरण करो।
जो कल्पवृक्ष के पुष्पों की गन्ध से युक्त मन्द-मन्द वायु से सेवित है, परमानन्दस्वरूप हैं तथा जिनके चरण कमलों में श्रीगंगाजी विराजमान हैं उन महानन्ददायक महापुरुष को नमस्कार करो।
जिन्होंने समस्त दिशाओं को सुगन्धित कर रखा है, जो चारों ओर से सैकड़ों कामधेनु गौओं से घिरे हुए हैं तथा देवताओं के भय को दूर करने वाले और बड़े-बड़े राक्षसों के लिये भयङ्कर हैं उन यदुनन्दन को नमस्कार करो।
जो करोड़ों कामदेवों से भी सुन्दर है, वाञ्छित फल के देने वाले हैं, दया के समुद्र हैं, उन श्रीकृष्णचन्द्र को छोड़कर ये नेत्र-युगल और किस विषय को देखने के लिये उत्सुक होते हैं।
अहो! खेद की बात है कि अत्यन्त पवित्र, अति सुन्दर रसमयी और मनोहारिणी हरिकथा को छोड़कर ये कर्णयुगल अन्य ग्राम्य-वार्ताओं के सुनने में श्रद्धा प्रकट करते हैं।
इन्द्रियों का यह परम दुर्भाग्य ही है कि नित्य विद्यमान श्रीकृष्णारूप विषय के रहते हुए भी वे अन्य क्षणिक और पापमय विषयों में आसक्त हो जाती हैं।
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