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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 17 • श्लोक 3
आकर्णपूर्णनेत्रं कुण्डलयुगमण्डितश्रवणम् । मन्दस्मितमुखकमलं सुकौस्तुभोदारमणिहारम् ॥
जिनके कर्णपर्यन्त विशाल नेत्र हैं, कान कुण्डल के जोड़े से सुशोभित हैं, मुख-कमल मन्द-मन्द मुसका रहा है, तथा वक्षःस्थल में कौस्तुभ-मणियुक्त सुन्दर हार है और
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