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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 17 • श्लोक 9
पुण्यतमामतिसुरसां मनोऽभिरामां हरेः कथां त्यक्त्वा । श्रोतुं श्रवणद्वन्द्वं ग्राम्यं कथमादरं भवति ॥
अहो! खेद की बात है कि अत्यन्त पवित्र, अति सुन्दर रसमयी और मनोहारिणी हरिकथा को छोड़कर ये कर्णयुगल अन्य ग्राम्य-वार्ताओं के सुनने में श्रद्धा प्रकट करते हैं।
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