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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 17 • श्लोक 4
वलयाङ्गुलीयकाद्यानुज्ज्वलयन्तं स्वलङ्कारान् । गलविलुलितवनमालं स्वतेजसापास्तकलिकालम् ॥
जो अपनी कान्ति से कङ्कण और अंगूठी आदि सुन्दर आभूषणों की भी शोभा बढ़ा रहे हैं, जिनके गले में बनमाला लटक रही है और अपने तेज से जिन्होंने कलिकाल को परास्त कर दिया है तथा
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