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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 17 • श्लोक 10
दौर्भाग्यमिन्द्रियाणां कृष्णे विषये हि शाश्वतिके । क्षणिकेषु पापकरणेष्वपि सज्जन्ते यदन्यविषयेषु ॥
इन्द्रियों का यह परम दुर्भाग्य ही है कि नित्य विद्यमान श्रीकृष्णारूप विषय के रहते हुए भी वे अन्य क्षणिक और पापमय विषयों में आसक्त हो जाती हैं।
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