मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें

अध्याय 15 — प्रबोध

प्रबोधसुधाकर
8 श्लोक • केवल अनुवाद
गुढ़ के पिण्ड में जो मधुरता होती है, वह उसके छोटे-से-छोटे कण में भी होती है, इस प्रकार गुडत्व और मधुरत्व में कोई भेद नहीं है।
अथवा जिस प्रकार कर्पूर और उसकी सुगन्ध में कोई भेद नहीं है उसी प्रकार जिनका चित्त आत्मस्वरूप हो गया है, उन पुरुषों के लिये यह संसार आत्मभाव को प्राप्त हो जाता है।
निद्रा के आरम्भ में और जागृति के अन्त में जिस (शुद्ध निर्विषय) भाव का अनुभव होता है वह यदि अन्तःकरण में स्थिर हो जाय तो उससे अद्वयानन्द की ही प्राप्ति होती है।
अति गम्भीर, अपार और विस्तृत सच्चिदानन्द-समुद्र में कर्म-वायु से प्रेरित हुई जीवात्मारूपी तरङ्गे उठती रहती हैं।
अपनी प्रचण्ड किरणों से देदीप्यमान अत्यन्त दीप्तिशाली चैतन्य-भास्कर के प्रकाश में ही सब ओर यह अनेक जीवरूप मृग-तृष्णा सर्वथा मिध्या ही प्रतीत हो रही है।
जिस चैतन्य-सूर्य को अपने अन्तःकरण में न देखने से ही अपने समीप इस जगत्की स्फूर्ति होती है और जिसे एक बार देख लेने पर ही यह असत् संसार मानो कहीं लीन हो जाता है,
उस परमानन्दरूप समुद्र में जो पुरुष बाहर-भीतर से पूर्ण होकर डूब गया है, उसकी दशा ऐसी होती है जैसे गंगाजी के महान् कुण्ड में चिरकाल से डूबा हुआ कोई कलश हो।
जो पूर्ण से भी पूर्ण और पर से भी पर है, जिसके पार का कोई पता नहीं है, जो भँवर और तरङ्गादि से रहित प्रज्ञारूपी सुधा का महान् समुद्र है तथा जो अपने कोटि-कोटि मूर्यो के सदृश प्रकाश से दर्शा दिशाओं को और प्रकाश को प्रकाशित तथा उज्ज्वल कर रहा है, उस निजानन्दमय परब्रह्म परमात्मा में जिनका मन डूबा हुआ है, उनकी दृष्टि में न मैं है, न तू है और न यह संसार ही है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें