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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 15 • श्लोक 7
बाह्याभ्यन्तरपूर्णः परमानन्दार्णवे निमग्नो यः । चिरमाप्लुत इव कलशो महाह्रदे जह्नुतनयायाः ॥
उस परमानन्दरूप समुद्र में जो पुरुष बाहर-भीतर से पूर्ण होकर डूब गया है, उसकी दशा ऐसी होती है जैसे गंगाजी के महान् कुण्ड में चिरकाल से डूबा हुआ कोई कलश हो।
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