यद्भावानुभवः स्यान्निद्रादौ जागरस्यान्ते ।
अन्तः स चेत्स्थिरः स्याल्लभते हि तदाद्वयानन्दम् ॥
निद्रा के आरम्भ में और जागृति के अन्त में जिस (शुद्ध निर्विषय) भाव का अनुभव होता है वह यदि अन्तःकरण में स्थिर हो जाय तो उससे अद्वयानन्द की ही प्राप्ति होती है।
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