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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 15 • श्लोक 4
अतिगम्भीरेऽपारे ज्ञानचिदानन्दसागरे स्फारे । कर्मसमीरणतरला जीवतरङ्गावलिः स्फुरति ॥
अति गम्भीर, अपार और विस्तृत सच्चिदानन्द-समुद्र में कर्म-वायु से प्रेरित हुई जीवात्मारूपी तरङ्गे उठती रहती हैं।
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