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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 15 • श्लोक 1
माधुर्यं गुडपिण्डे यत्तत्तस्यांशकेऽणुमात्रेऽपि । एवं न पृथग्भावो गुडत्वमधुरत्वयोरस्ति ॥
गुढ़ के पिण्ड में जो मधुरता होती है, वह उसके छोटे-से-छोटे कण में भी होती है, इस प्रकार गुडत्व और मधुरत्व में कोई भेद नहीं है।
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