अथवा न भिन्नभावः कर्पूरामोदयोरेवम् ।
आत्मस्वरूपमनसां पुंसां जगदात्मतां याति ॥
अथवा जिस प्रकार कर्पूर और उसकी सुगन्ध में कोई भेद नहीं है उसी प्रकार जिनका चित्त आत्मस्वरूप हो गया है, उन पुरुषों के लिये यह संसार आत्मभाव को प्राप्त हो जाता है।
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