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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 15 • श्लोक 6
अन्तरदृष्टे यस्मिञ्जगदिदमारात्परिस्फुरति । दृष्टे यस्मिन्सकृदपि विलीयते क्वाप्यसद्रूपम् ॥
जिस चैतन्य-सूर्य को अपने अन्तःकरण में न देखने से ही अपने समीप इस जगत्की स्फूर्ति होती है और जिसे एक बार देख लेने पर ही यह असत् संसार मानो कहीं लीन हो जाता है,
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