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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 15 • श्लोक 8
पूर्णात्पूर्णतरे परात्परतरेऽप्यज्ञातपारे हरौ संवित्स्फारसुधार्णवे विरहिते वीचीतरङ्गादिभिः । भास्वत्कोटिविकासितोज्ज्वलदिगाकाशप्रकाशे परे स्वानन्दैकरसे निमग्नमनसां न त्वं न चाहं जगत् ॥
जो पूर्ण से भी पूर्ण और पर से भी पर है, जिसके पार का कोई पता नहीं है, जो भँवर और तरङ्गादि से रहित प्रज्ञारूपी सुधा का महान् समुद्र है तथा जो अपने कोटि-कोटि मूर्यो के सदृश प्रकाश से दर्शा दिशाओं को और प्रकाश को प्रकाशित तथा उज्ज्वल कर रहा है, उस निजानन्दमय परब्रह्म परमात्मा में जिनका मन डूबा हुआ है, उनकी दृष्टि में न मैं है, न तू है और न यह संसार ही है।
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