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अध्याय 94 — अथ हस्तिचेष्टिताध्यायः

बृहत्संहिता
14 श्लोक • केवल अनुवाद
गजदन्त के मूल में जितनी अङ्गुलात्मक परिधि हो, उसको द्विगुणित करने पर जो प्राप्त हो तत्तुल्य मूल से परित्याग कर शेष भाग से समस्त कल्पनायें करनी चाहिये। जलप्राय देश के हाथियों में उससे कुछ अधिक और पर्वतचारी हाथियों में उससे कुछ कम भाग का परित्याग करना चाहिये ।
काटने के समय हाथी के दाँत में बिल्ववृक्ष, वर्धमान, छत्र, ध्वज या चामर की तरह. चिह्न दिखाई दे तो आरोग्य, घन की वृद्धि और सुख होता है।
शख के समान चिह्न दिखाई दे तो जय, नदी के आवर्त (जलभ्रम) के समान चिह्न दिखाई दे तो नष्ट देश की प्राप्ति और देले के समान चिह्न दिखाई दे तो पूर्व में प्राप्त देश की प्राप्ति होती है।
खी के समान चिह्न दिखाई दे तो धन का नाश, भृङ्गार के समान चिह्न दिखाई दे तो पुत्र की उत्पत्ति, घड़े के समान चिह्न दिखाई दे तो निधि की प्राप्ति और दण्ड के समान चिह्न दिखाई दे तो यात्रा में विघ्न होता है।
गिरगिट, छिपकली, वानर या सर्प की तरह चिह्न हो तो दुर्भिक्ष, व्याधि और शत्रु के अधिकार में रहना होता है तथा गिद्ध, उल्लू, काक या बाज के समान चिह्न हो तो मरकी होती है।
पात (फाँसी) या कबन्ध (विना शिर का पुरुष) के समान चिह्न हो तो राजा को मृत्यु, काटने पर रक्त निकले तो मनुष्यों के ऊपर वित्ति तथा काला, पीला, रूखा या दुर्गन्धि हो तो अशुभ होता है।
यदि दाँत का छेद सफेद, समान, सुगन्धि या निर्मल हो तो शुभ होता है। ये सब आसन के फल हैं। इसी तरह पूर्वोक्त सब लक्षण शय्या में भी फल देते हैं।
हाथी के दाँत के मूल, मध्य और अप्रभाग में क्रम से देवता, दैत्य और मनुष्य निवास करते हैं। जैसे दन्तमूल में देवता, मध्य में दैत्य और दन्ताग्र में मनुष्य निवास करते हैं। साथ ही मूल में बक्ष्यमाण में फल पुष्ट, मध्य में मध्यम और अन में अल्प होता है; इसी तरह मूल में वक्ष्यमाण फल शीघ्र (सप्ताह के मध्य में), मध्य में मध्य- काल में (एक मास के अन्दर) और प्रान्त में देर से होता है ।
यदि दक्षिण भाग का दाँत मूल से टूट जाय तो राजा को भागने का भय, मध्य से टूट जाय तो देश को भागने का भय और अग्र भाग से टूट जाय तो सेना को भागने का भय रहता है। यदि वाम भाग का दाँत मूल आदि से टूट जाय तो क्रम से राजपुत्र, पुरोहित, साधनपति तथा सेना, खी और प्रधान पुरुष को मारता है।
यदि हाथी के दोनों दाँत दूर्य जाएँ तो राजा के सम्पूर्ण कुल का क्षय होता है। शुभ ग्रह के लग्न (वृष, मिथुन, कर्क, कन्या, तुला, धनु और मोन), शुभ तिथि (रिक्तावर्जित तिथि), शुभ नक्षत्र ( दारुण उग्र नक्षत्र को छोड़कर शेष नक्षत्र) आदि में उत्पन्न हाथो हो तो शुभ फलों की वृद्धि होती है और इससे विपरीत समय में उत्पन्न हो तो पाप फलों की वृद्धि होती है।
यदि वाम भाग का दाँत दूध वाले, मधुर फल वाले या फूल वाले वृक्षों के घर्षण या नदी के तट को विघट्टित करने पर मध्य से टूट जाय तो शत्रुनाश करता है। इसके विपरीत ( दुष्ट वृक्षों के घर्षण से वाम दन्त का अग्र या मूल टूट जाय) तो शत्रु की वृद्धि करता है।
चलते हुए हाथी की गति अचानक रुक जाय, कान हिलना बन्द हो जाय, अत्यन्त दीनतापूर्वक सूड को भूमि पर रखकर धीरे-धीरे लम्बी-लम्बों सांस लेकर चकित और अर्पोन्मिलित दृष्टि हो जाय, बहुत देर तक सपन, उलटा चलने लगे, अभक्ष्य वस्तु का भक्षण करे तथा बहुत बार रक्तमिश्रित मलत्याग करे तो भय देने वाला होता है।
यदि हाथो अपनी इच्छा से वल्मीक, स्थाणु (शाखारहित वृक्ष), गुल्म, घास या अन्य किसी वृक्ष को मधन करते-करते हर्षित दृष्टि और ऊँचा मुख करके शीघ्र गति से यात्रा के अनुकूल चले तथा हौदा कसने के समय जलबिन्दु उड़ाये, गर्जन करे, मदयुक्त हो जाय या सूड़ से दाहिने दाँत को लपेटे तो जय देने वाला होता है।
'यदि हाथी को पकड़ कर ग्राह जल में प्रवेश कर जाय तो राजा का नाश और ग्राह को पकड़ कर हाथी जल से बाहर निकल जाय तो राजा की वृद्धि करता है।
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