वल्मीक स्थाणुगुल्मक्षुषतरुमथनस्वेच्छया दृष्टदृष्टि- र्यायाद्यात्रानुलोमं त्वरितपदगतिर्वक्त्रमुन्नाम्य चोच्चः ।
कक्ष्यासन्नाहकाले जनयति च मुहुः शीकरं बृंहितं वा तत्काले वा मदाप्तिर्जयकृदथ रदं वेष्टयन् दक्षिणं च ॥
यदि हाथो अपनी इच्छा से वल्मीक, स्थाणु (शाखारहित वृक्ष), गुल्म, घास या अन्य किसी वृक्ष को मधन करते-करते हर्षित दृष्टि और ऊँचा मुख करके शीघ्र गति से यात्रा के अनुकूल चले तथा हौदा कसने के समय जलबिन्दु उड़ाये, गर्जन करे, मदयुक्त हो जाय या सूड़ से दाहिने दाँत को लपेटे तो जय देने वाला होता है।
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