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बृहत्संहिता • अध्याय 94 • श्लोक 8
मूलमध्यदशनाप्रसंस्थिता देवदैत्यमनुजाः क्रमात् ततः । स्फीतमध्यपरिपेलवं फलं शीघ्रमध्यचिरकालसम्भवम् ॥
हाथी के दाँत के मूल, मध्य और अप्रभाग में क्रम से देवता, दैत्य और मनुष्य निवास करते हैं। जैसे दन्तमूल में देवता, मध्य में दैत्य और दन्ताग्र में मनुष्य निवास करते हैं। साथ ही मूल में बक्ष्यमाण में फल पुष्ट, मध्य में मध्यम और अन में अल्प होता है; इसी तरह मूल में वक्ष्यमाण फल शीघ्र (सप्ताह के मध्य में), मध्य में मध्य- काल में (एक मास के अन्दर) और प्रान्त में देर से होता है ।
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