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बृहत्संहिता • अध्याय 94 • श्लोक 12
स्खलितगतिरकस्मात् त्रस्तकर्णोऽतिदीनः श्वसिति मृदु सुदीर्घ न्यस्तहस्तः पृथिव्याम् । द्रुतमुकुलितदृष्टिः स्वप्नशीलो विलोमो भयकृदहित भक्षी नैकशोऽ सृक्शकृत्कृत् ॥
चलते हुए हाथी की गति अचानक रुक जाय, कान हिलना बन्द हो जाय, अत्यन्त दीनतापूर्वक सूड को भूमि पर रखकर धीरे-धीरे लम्बी-लम्बों सांस लेकर चकित और अर्पोन्मिलित दृष्टि हो जाय, बहुत देर तक सपन, उलटा चलने लगे, अभक्ष्य वस्तु का भक्षण करे तथा बहुत बार रक्तमिश्रित मलत्याग करे तो भय देने वाला होता है।
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