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बृहत्संहिता • अध्याय 94 • श्लोक 1
दन्तस्य मूलपरिधिं द्विरायतं प्रोह्य कल्पयेच्छेषम् । अधिकमनूपचराणां न्यूनं गिरिचारिणां किश्चित् ॥
गजदन्त के मूल में जितनी अङ्गुलात्मक परिधि हो, उसको द्विगुणित करने पर जो प्राप्त हो तत्तुल्य मूल से परित्याग कर शेष भाग से समस्त कल्पनायें करनी चाहिये। जलप्राय देश के हाथियों में उससे कुछ अधिक और पर्वतचारी हाथियों में उससे कुछ कम भाग का परित्याग करना चाहिये ।
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