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अध्याय 61 — अथ गोलक्षणाध्यायः

बृहत्संहिता
19 श्लोक • केवल अनुवाद
पराशर मुनि ने अपने शिष्य बृहद्रथ से जो गोलक्षण कहा है, यहाँ पर मैं उसका संक्षेप में वर्णन करता हूँ। यद्यपि सभी गौवें शुभ लक्षण वाली होती हैं, तथापि मुनि- प्रणित शास्त्र से लेकर उनका शुभाशुभ लक्षण यहाँ कहते हैं।
आसुओं से भरी आँखों वाली, गँदली आँखों वाली, रूखी आँखों वाली, चूहे के समान आँखों वाली, हिलती हुये सींग वाली, चपटे सींग वाली, कृष्ण, लोहित वर्ण वाली और गदहे के समान वर्ण वाली गौ शुभ देने वाली नहीं होती है।
दश, सात या चार दाँत वाली, लम्बी मुख वाली, विना सींग वाली, झुकी हुई पीठ वाली, छोटी तथा मोटी गरदन वाली, जौ के समान मध्य भाग से मोटी, फटे हुये खुर वाली,
श्याम रंग की लम्बी जिह्वा वाली, बहुत छोटे, बहुत बड़े या बहुत मोटे गुल्फ वाली, दुबली, कम अंग वाली या अधिक अंग वाली गौ शुभ देने वाली नहीं होती है।
पूर्वकथित लक्षणों से युक्त बैल भी शुभ नहीं होता है। साथ ही मोटे और लम्बे अण्डकोश वाला, शिराओं से व्याप्त पूर्व पादद्वय बाला, मोटी शिराओं से व्याप्त कपोल वाला, तीन स्थानों से मेहन करने वाला (जिसके नेत्रों से आँसू एवं शिश्न से मूत्र और पुरीष एक साथ गिरता हो वह), बिल्ली के समान नेत्र वाला
पीला और कृष्ण- लोहित वर्ण वाला बैल ब्राह्मण को भी शुभ देंवाला नहीं होता है; फिर अन्य वर्णों की तो बात ही क्या है? जिसके ओठ, तालु या जीभ काले हों और जो हाँफने वाला हो, ऐसा बैल अपने यूथ का नाश करता है।
स्थूल गोबर, स्थूल लिंग का अग्र भाग और स्थूल सींग वाला, सफेद पेट वाला और कृष्ण-लोहित वर्ण वाला बैल यदि अपने घर में भी उत्पन्न हुआ हो तो भी उसका त्याग कर देना चाहिये; क्योंकि ऐसा बैल भी यूच का नाश करने वाला होता है।
जिस बैल के देह में श्याम वर्ण के फूल के समान चिह्न हो, सफेद और लाल मिश्रित वर्ण हो और बिल्ली के समान जिसके नेत्र हों, ऐसा बैल यदि ब्राह्मणों द्वारा भो ग्रहण कर लिया जाय तो उनका भी वह बैल शुभ नहीं करता है।
गाड़ी आदि में जोड़ा हुआ बैल, कर्दम में गढ़े पाँव को उठाने की तरह पाँव उठाने वाला, दुर्बल ग्रीवा वाला और छोटी या दबी हुई पीठ वाला बैल भार उठाने में समर्थ नहीं होता है।
कोमल, मिले हुये और ताम्र वर्ण के समान ओंठ वाले, छोटी कटिस्थ मांसपिण्ड वाले, ताम्र वर्ण के तालु और जीभ वाले, छोटे-पतले तथा ऊँचे कान वाले, सुन्दर पेट वाले, सीधी जंघा वाले,
ताम्र वर्ण के मिले हुये खुर वाले, बड़ी धूही वाले, चिकने, कोमल तथा पतली त्वचा और रोम वाले, ताम्र वर्ण के सींग तथा शरीर वाले,
पतली और भूमि को स्पर्श करने वाली पूँछ वाले, लाल नेत्रान्त वाले, अधिक सांस लेने वाले, सिंह के समान कन्ये वाले, पतले और छोटे गलकम्बल वाले और सुन्दर गति वाले बैल अच्छे होते हैं।
जिनके वाम पार्श्व वामावर्त और दक्षिण पार्श्व दक्षिणावर्त रोमों से युक्त हों तथा जिनकी जंघा ऐणक (मृग) की जंघा के समान हो, ऐसे बैल शुभ होते हैं।
वैदूर्य मणि, मल्लिका ( वेला) पुष्य या जलयुद्धद के समान नेत्र वाले, स्थूल नेत्र और शरीर वाले, जिसके खुर के पिछले भाग फूटे न हों- ऐसे बैल शुभ तथा भार उठाने में समर्थ होते हैं।
जिसके नाक के समीप वलि हो, बिल्ली के समान मुख हो, दाहिना भाग सफेद हो, कमल या लाख के समान कान्ति हो, अच्छी पूँछ हो, घोड़े के समान गति हो, लम्बे अण्डकोश हों, भेड़ के समान पेट हो
पिछली जङ्घा और अण्डकोश का मध्य भाग तथा अगली जङ्घाओं का मध्य भाग सङ्कुचित हो-ऐसा बैल भार उठाने में तथा चलने में समर्थ होता है। साथ ही घोड़े के समान गति वाला बैल शुभ फल प्रदान करने वाला होता है।
सफेद वर्ण वाला, ताम्र वर्ण के सींग और आँखों वाला तथा बड़े मुख वाला बैल 'हंस' संज्ञक होता है। यह बैल शुभ फल प्रदान करने वाला तथा यूथ को बढ़ाने वाला होता है।
जिसकी पूँछ भूमि को छूती हो, ताम्र वर्ण का सींग हो, लाल आँखें हों, पूही से युक्त हो और कल्माष (लाल सफेद और पीला मिश्रित) वर्ण हो, ऐसा बैल शौघ्र हो अपने स्वामी को धनी बना देता है।
किसी भी रंग के बैल के यदि चारो पाँव सफेद हों तो वह शुभ करने वाला होता है। यदि सर्वथा शुभ लक्षणयुत बैल न मिले तो मिश्रित फल वाला भी ग्रहण करना चाहिये; परन्तु उसमें शुभ फल की मात्रा अधिक होनी चाहिये।
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