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अध्याय 42 — अथार्घकाण्डाध्यायः

बृहत्संहिता
14 श्लोक • केवल अनुवाद
मेषादि राशियों में सूर्य के गमन करने पर प्रति मास की अमावास्या और पूर्णिमा में अतिवृष्टि, उल्का, दण्ड, परिवेष, ग्रहण, परिधि आदि
(रजोनिहार, दिग्दाह और गन्धर्वनगर रूप) उत्पातों को देख कर द्रव्यों के विशेष मौल्य का विचार करना चाहिये। अन्य ( अमावास्या और पूर्णिमा से भिन्न) तिथि में होने वाले उत्पात राजाओं को शत्र-कलह से पीड़ित करते हैं।
मेष राशि में स्थित सूर्य के समय में ग्रीष्म प्रऋतु में उत्पन्न होने वाले धान्यों का तथा बृष राशि में स्थित सूर्य के समय में उसमें होने वाले मूल और फलों का संग्रह करे, उन (मेष और वृष) से चतुर्थ मास में उसको विक्रय करने से लाभ होता है।
मिथुन राशिगत सूर्य के समय में मधुर आदि सभी रसों का संग्रह करके उससे छठे मास में विक्रय करने से बहुत लाभ होता है।
कर्क राशिगत सूर्य के समय में मधु, सुगन्ध, द्रव्य, तेल, घी और शक्कर का संग्रह करके दूसरे मास में विक्रय करने से दूना लाभ होता है। दो महीने से कम या अधिक में विक्रय करने से नाश होता है।
सिंह राशिगत सूर्य के समय में सोना, मणि, चमड़ा, शख, मोती और चाँदी का संग्रह करके पाँचवें मास में विक्रय करने से लाभ होता है। न्यूनाधिक काल में विक्रय करने से हानि होती है।
कन्या राशिगत सूर्य के समय पूर्वोक्त उत्पातों को देख कर चामर, गहदा, कैट और घोड़ों का संग्रह करके छठे मास में विक्रय करने से दूना लाभ होता है।
तुला राशिगत सूर्य के समय पूर्वोक्त उत्पातों को देखकर सूती तथा ऊनी वत्र, वर्तन, मणि, कम्बल, काँच, पीले वत्र, पुष्प और धान्यों का संग्रह करके छठे मास में विक्रय करने से दूना लाभ होता है।
वृश्चिक राशिगत सूर्य के समय पूर्वोक्त उत्पात होने पर फल, कन्द, मूल और अनेक प्रकार के रत्नों का संग्रह करके दो वर्ष बाद विक्रय करने से दूना लाभ होता है।
धनु राशिगत सूर्य के समय में पूर्वोक्त उत्पात होने पर कुंकुम, शङ्ख, मूँगा, काँच और मोतियों का संग्रह करके छः मास बाद विक्रय करने से दूना लाभ होता है।
मकर या कुम्भ राशिगत सूर्य के समय पूर्वोक्त उत्पात होने पर लोहा, बर्तन और धान्यों का संग्रह करके एक मास बाद बेचने से लाभाथों व्यापारी दूना लाभ प्राप्त करता है। मृगो मकरः । घटः कुम्भः। सवितर्यादित्ये मृगपटसंस्थे लोहभाण्डधान्यानि गृहीयात् स्थापयेत्। लोहमयानि भाण्डानि धान्यानि च मासं स्थित्वा मासं संस्थाप्य ततो दद्याद्विक्रयं कुर्यात्। लाभार्थी द्विगुणं लाममाप्नोति लभते ।
मीन राशिगत सूर्य के समय पूर्वोक्त उत्पात होने पर मूल, फल, कन्द, बर्तन और रत्नों का संग्रह करके छः मास बाद बेचने से मनमाना लाभ होता है।
जिस-जिस राशि में स्थित चन्द्र या सूर्य अपने तात्कालिक अधिमित्र ग्रह से युत या दृष्ट हों, उसी राशि में पूर्वोक्त लाभ होता है; अन्यत्र नहीं।
जिस राशि में सूर्ययुत चन्द्र या पूर्णचन्द्र शुभग्रह (बुध, बृहस्पति और शुक) से पुत या दृष्ट हो, उस राशिसम्बन्धी द्रव्य में मौल्य की वृद्धि करता है तथा जिस राशि में पापग्रह (मङ्गल और शनि से युत या दृष्ट हो, उस राशिसम्बन्धी द्रव्यों का नाश करता है। इसी प्रकार प्रत्येक राशिगत द्रव्यों को जानकर शुभाशुभ फल कहना चाहिये ।
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