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बृहत्संहिता • अध्याय 42 • श्लोक 4
मिथुनस्थे सर्वरसान् धान्यानि च संग्रहं समुपनीय । षष्ठे मासे विपुलं विक्रेता प्राप्नुयाल्लाभम् ॥
मिथुन राशिगत सूर्य के समय में मधुर आदि सभी रसों का संग्रह करके उससे छठे मास में विक्रय करने से बहुत लाभ होता है।
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