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अध्याय 23 — अथ प्रवर्षणाध्यायः
बृहत्संहिता
10 श्लोक • केवल अनुवाद
ज्येष्ठमासस्येयं पौर्णमासी ज्यैष्ठी, तस्यां समतीतायामतिक्रान्तायां पूर्वाषाढादिसम्प्रवृष्टेन पूर्वाषाढामादितः कृत्वा सर्वेषु नक्षत्रेषु सम्प्रवृष्टेन प्रवर्षितेन तज्ज्ञैः पण्डितैरम्भसो जलस्य परिमाणं शुभमशुभं वा वाच्यं वक्तव्यम्। वृष्टौ शुभमवृष्टावशुभमिति। तथा च गर्ग:- ज्येष्ठे मूलमतिक्रम्य मासि प्रतिपदग्रतः। वर्षासु वृष्टिज्ञानार्थ निमित्तान्युपलक्षयेत्।
एक हाथ तुल्य व्यास वाले और एक हाथ गहरे वर्तुलाकार कुण्ड से वृष्टि के जल का मापन करना चाहिये, जल से पूर्ण इस कुण्ड में पचास पल (एक आढ़क) तुल्य जल होता है। पचास पल का एक आदक और चार आढ़क का एक द्रोण होता है।
जिस वृष्टि से पृथ्वी पर धूलि मिट जाय या तृणाग्र में जलकण दिखाई दें, उससे जल का प्रमाण कहना चाहिये। इससे यह सिद्ध होता है कि पूर्वाषाढ़ा आदि नक्षत्रों में से जिस नक्षत्र में वृष्टि हो, उसी नक्षत्र के परिणाम (इसी अध्याय के छठे श्लोक से उक्त) तुल्य वृष्टि कहनी चाहिये ।
कोई-कोई मुनि (कश्यप आदि) का मत है कि प्रवर्षणकाल (ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा के अनन्तर पूर्वाषादा आदि सत्ताईस नक्षत्रयुत काल) में किसी एक प्रदेश में भी वृष्टि हो तो वर्षाकाल में सुन्दर वृष्टि होती है। अन्य ट्रेवल आदि) का मत है कि यदि प्रवर्षणकाल में कम से कम दश योजन तक वृष्टि हो तो वर्षाकाल में उत्तम वृष्टि होती है। गर्ग, वसिष्ठ और पराशर का मत है कि प्रवर्षणकाल में बारह योजन तक वृष्टि होने से वर्षाकाल में उत्तम वृष्टि होती है।
प्रवर्षणकाल में पूर्वाषाढ़ा आदि नक्षत्रों में से जिस किसी नक्षत्र में वृष्टि हो तो प्रसवकाल में उसी नक्षत्र में फिर वृष्टि होती है। यदि प्रवर्षणकाल में पूर्वाषाढ़ा आदि सब नक्षत्रों में वृष्टि न हो तो प्रसवकाल में अनावृष्टि होती है।
हस्त, पूर्वाषाढ़ा, मृगशिरा, चित्रा, रेवतो या धनिष्ठा नक्षत्र में यदि प्रवर्षणकाल में वृष्टि हो तो प्रसवकाल में सोलह द्रोण वृष्टि होती है। इसी तरह शतभिषा, ज्येष्ठा और स्वाती में चार द्रोण; कृत्तिका में दश द्रोण
श्रवणा, मघा, अनुराधा, भरणी और मूल में चौदह द्रोण; पूर्वफाल्गुनी में पच्चीस द्रोण; पुनर्वसु में बीस द्रोण; विशाखा और उत्तराषाढ़ा में बीस द्रोण;
आश्लेषा में तेरह द्रोण; उत्तरभाद्रपदा, उत्तरफाल्गुनी और रोहिणी में पच्चीस द्रोण; पूर्वभाद्रपदा और पुष्य में पन्द्रह द्रोण
अश्विनी में बारह द्रोण तथा आद्रां में यदि प्रवर्षणकाल में वृष्टि हो तो प्रसवकाल में अट्ठारह द्रोण वृष्टि होती है।
सूर्य, शनैश्वर, केतु, मङ्गल या त्रिविध उत्पातों (दिव्य, आन्तरिक्ष और भौम) से यदि नक्षत्र पोडित हों तो अमङ्गल और वृष्टि का अभाव होता है। यदि उपद्रवरहित होकर बुध, बृहस्पति या शुक्र से युत नक्षत्र हो तो मङ्गल कृति और वृष्टि होती है।
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