येन धरित्री मुद्रा जनिता वा बिन्दवस्तृणाग्रेषु । वृष्टेन तेन वाच्यं परिमाणं वारिणः प्रथमम् ॥
जिस वृष्टि से पृथ्वी पर धूलि मिट जाय या तृणाग्र में जलकण दिखाई दें, उससे जल का प्रमाण कहना चाहिये। इससे यह सिद्ध होता है कि पूर्वाषाढ़ा आदि नक्षत्रों में से जिस नक्षत्र में वृष्टि हो, उसी नक्षत्र के परिणाम (इसी अध्याय के छठे श्लोक से उक्त) तुल्य वृष्टि कहनी चाहिये ।
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