ऐन्द्राग्न्याख्ये वैश्वे च विंशतिः सार्पभे दश त्र्यधिकाः । आहिर्बुध्न्यार्यम्णप्राजापत्येषु पञ्चकृतिः ॥
आश्लेषा में तेरह द्रोण; उत्तरभाद्रपदा, उत्तरफाल्गुनी और रोहिणी में पच्चीस द्रोण; पूर्वभाद्रपदा
और पुष्य में पन्द्रह द्रोण
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