पञ्चदशाजे पुष्ये च कीर्तिता वाजिभे दश द्वौ च ।
रौद्रेऽष्टादश कथिता द्रोणा निरुपद्रवेष्वेते ॥
अश्विनी में बारह द्रोण तथा आद्रां में यदि प्रवर्षणकाल में वृष्टि हो
तो प्रसवकाल में अट्ठारह द्रोण वृष्टि होती है।
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