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बृहत्संहिता • अध्याय 23 • श्लोक 4
केचिद्यथाभिवृष्टं दशयोजनमण्डलं वदन्त्यन्ये । गर्गवसिष्ठपराशरमतमेतद् परम् ॥
कोई-कोई मुनि (कश्यप आदि) का मत है कि प्रवर्षणकाल (ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा के अनन्तर पूर्वाषादा आदि सत्ताईस नक्षत्रयुत काल) में किसी एक प्रदेश में भी वृष्टि हो तो वर्षाकाल में सुन्दर वृष्टि होती है। अन्य ट्रेवल आदि) का मत है कि यदि प्रवर्षणकाल में कम से कम दश योजन तक वृष्टि हो तो वर्षाकाल में उत्तम वृष्टि होती है। गर्ग, वसिष्ठ और पराशर का मत है कि प्रवर्षणकाल में बारह योजन तक वृष्टि होने से वर्षाकाल में उत्तम वृष्टि होती है।
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