Krishjan
🇺🇸 EN
🇮🇳 हिन्दी
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
अध्याय 100 — अथ करणगुणाध्यायः
बृहत्संहिता
8 श्लोक • केवल अनुवाद
वव, वालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि-ये सात चल करण हैं। इनके क्रम से इन्द्र, ब्रह्मा, मित्र, अर्थमा, भूमि, श्री और यम स्वामी होते हैं।
कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के उत्तरार्ध में शकुनि, अमावास्या के पूर्वार्ध में नाग, उत्तरार्थ में चतुष्पद और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के पूर्वार्ध में किंस्तुघ्न करण होता है। ये चार स्थिर करण हैं। इनके स्वामी क्रम से कलि, वृष, सर्प और पवन हैं।
*वव करण में शुभ (धर्म आदि), चर (अल्प समय में होने वाला), स्थिर ( बहुत देर तक ठहरने वाला) और पुष्टि (शरीर-पुष्टिकारक) कार्य करना शुभ होता है। वालव करण में धर्मक्रिया और ब्राह्मणों के हित का कार्य करना शुभ है। कौलव करण में प्रीति ( किसी के साथ स्नेह), मित्र और वरण (कन्यावरण) करना शुभ है। तैतिल करण में सौभाग्य (जिस कार्य को करने से सबका प्रिय हो), संश्रय और गृहसम्बन्धी कार्य करना शुभ है।
गर करण में खेती, बौज और आश्रमसम्बन्धी कार्य करना शुभ है। वणिज करण में स्थिर कार्य, वाणिज्य और युति (किसी के साथ संयोग) सम्बन्धी कार्य करना शुभ है। विष्टि करण में किया हुआ कोई भी कार्य शुभ नहीं होता है; किन्तु केवल शत्रुओं का नाश, विष आदि का प्रयोग और अग्निदाह आदि कार्य करना शुभ है।
शकुनि करण में पौष्टिक कार्य, औषधिसेवन आदि, मूल ( जड़ को लेना, रोपना, खाना) और मन्त्रसाधनसम्बन्धी कार्य करना शुभ है। चतुष्पद करण में गाय, ब्राह्मण, पितर और राज्यसम्बन्धी कार्य करना शुभ है। नाग करण में स्थावर, दारुण, हरण और दौर्भाग्य (जिस कार्य को करने से दूसरे से द्वेष उत्पन हो, उसके) सम्बन्धी कार्य करना शुभ है तथा किंस्तुघ्न करण में धर्म, इष्टि (पुत्रकाम्य आदि), पुष्टि (शरीरपुष्टि), मंगल (विवाह आदि) और सिद्धिक्रिया (जिस क्रिया को करने से कार्य की सिद्धि हो, उसके) सम्बन्धी कार्य करना शुभ है।
लग्न से ग्यारहवें और तीसरे में शुभ ग्रह हों, शुभ ग्रह की राशि (वृष, मिथुन, कन्या, तुला, धनु और मीन लग्न में हो, पाप ग्रह (सूर्य, मंगल और शनि से रहित होकर लग्न बृहस्पति से युत हो तथा पुष्य, मृगशिरा, चित्रा, श्रवण और रेवती नक्षत्रों में कर्णवेध शुभ होता है।
रोहिणी, तीनों उत्तरा, रेवती, मृगशिरा, मूल, अनुराधा, मघा, हस्त और स्वाती नहरों में; कन्या, तुता और मिथुन लग्नों में एवं सपाम, अहम और द्वादश स्थानों से भित्र स्थानों में शुभ ग्रह से, एकादश, द्वितीय या तृतीय स्थानों में चन्द्र हो, तृतीय, पा और एकादश में पाप ग्रह हों तथा यह में शुक्र और अहम में मंगल न हो तो विवाह शुभ होता है। वा, कन्या दोनों में से किसी एक की राशि से दूसरे की राशि दूसरी, नमों और आठयों न हो अर्थात् द्विद्वादश, नवमयम और षट्काटक राशि से रहित राशि हो, सूर्य करानुकूल (तृतीय, षठ, दशम या एकादश स्थान में स्थित) हो,
विटि करण, रित्तय तिथि, पावार, रायन (दक्षिणायन), चैत्र और पौष मास-एन सबों को छोड़ कर भानुष ( द्विपमंकलन मिथुन, कन्या और तुला) में विवाह शुभ होता है। यहाँ पर पौष और चैत्र मास का निषेध कर रहे है, किन्तु दक्षिणायन में हो को होने के कारण दक्षिणायन के रिपेय से ही पौष का निषेध हो जाता है, फिर पौष का निषेध क्यों किया? यहाँ आचार्य का अभिनय यह है कि दक्षिणायन में स्थित कार्तिक और मार्गशीर्ष में विवाह करना चाहिये लेकिन उत्तरायन में तिथत चैत्र में विवह नहीं करना चाहिये।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें