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बृहत्संहिता • अध्याय 100 • श्लोक 8
दम्पत्योद्विनवाष्टराशिरहिते चारानुकूले रबौ चन्द्रे चार्ककुजार्किशुक्रवियुते मध्येऽथवा पापयोः । त्यक्त्वा च व्यतिपातवैधृतिदिनं विष्टिं च रिक्तां तिथिं क्रूराहायनपौषचैत्रविरहे लग्नांशके मानुषे ॥
विटि करण, रित्तय तिथि, पावार, रायन (दक्षिणायन), चैत्र और पौष मास-एन सबों को छोड़ कर भानुष ( द्विपमंकलन मिथुन, कन्या और तुला) में विवाह शुभ होता है। यहाँ पर पौष और चैत्र मास का निषेध कर रहे है, किन्तु दक्षिणायन में हो को होने के कारण दक्षिणायन के रिपेय से ही पौष का निषेध हो जाता है, फिर पौष का निषेध क्यों किया? यहाँ आचार्य का अभिनय यह है कि दक्षिणायन में स्थित कार्तिक और मार्गशीर्ष में विवाह करना चाहिये लेकिन उत्तरायन में तिथत चैत्र में विवह नहीं करना चाहिये।
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