कुर्याद्ववे
शुभचरस्थिरपौष्टिकानि
च वालवाख्ये ।
कौलवे स्युः
धर्मक्रियाद्विजहितानि
सम्प्रीतिमित्रवरणानि च
सौभाग्यसंश्रयगृहाणि
च तैतिलाख्ये
*वव करण में शुभ (धर्म आदि), चर (अल्प समय में होने वाला), स्थिर ( बहुत देर तक ठहरने वाला) और पुष्टि (शरीर-पुष्टिकारक) कार्य करना शुभ होता है। वालव करण में धर्मक्रिया और ब्राह्मणों के हित का कार्य करना शुभ है। कौलव करण में प्रीति ( किसी के साथ स्नेह), मित्र और वरण (कन्यावरण) करना शुभ है। तैतिल करण में सौभाग्य (जिस कार्य को करने से सबका प्रिय हो), संश्रय और गृहसम्बन्धी कार्य करना शुभ है।
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