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बृहत्संहिता • अध्याय 100 • श्लोक 2
कृष्णचतुर्दश्यर्थाद् ध्रुवाणि शकुनिश्चतुष्पदं नागम् । किंस्तुघ्नमिति च तेषां कलिवृषफणिमारुताः पतयः ॥
कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के उत्तरार्ध में शकुनि, अमावास्या के पूर्वार्ध में नाग, उत्तरार्थ में चतुष्पद और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के पूर्वार्ध में किंस्तुघ्न करण होता है। ये चार स्थिर करण हैं। इनके स्वामी क्रम से कलि, वृष, सर्प और पवन हैं।
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